रीवा में प्राकृतिक नीतियों पर संगोष्ठी, नदियों-भूगर्भ पर मंथन
रीवा। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा के भूगर्भ शास्त्र विभाग द्वारा नेचुरल रिसोर्सेस एंड एनवायरनमेंटल सस्टेनेबिलिटी विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ समापन.
दो दिवसीय कार्यक्रम का हुआ समापन
शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय रीवा में मध्य प्रदेश शासन उच्च शिक्षा विभाग एवं एन.एम.डी.सी. के सहयोग से नेचुरल रिसोर्सेस एंड एनवायरनमेंटल सस्टेनेबिलिटी विषय पर आयोजित दो-दिवसीय (18 एवं 19 मार्च 2026) राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफलतापूर्वक समापन हुआ. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. सनत त्रिपाठी डीन एग्रिकल्चर महाविद्यालय रीवा एवं विशिष्ट अतिथि डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी प्राचार्य श्रीयुत महाविद्यालय रीवा एवं संतोष कुमार पाठक वरिष्ठ प्रबंधक भू- विज्ञान एनएमडीसी रहे।
प्राचार्य प्रो. रवीन्द्र नाथ तिवारी ने क्या कहा?
समापन समारोह की अध्यक्षता प्राचार्य प्रो. रवीन्द्र नाथ तिवारी ने किया. द्वितीय दिवस तकनीकि सत्र में संरक्षक एवं महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. रवीन्द्र नाथ तिवारी ने राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में बढ़ते पर्यावरणीय संकट और जल की कमी को मानव सभ्यता के सामने एक गंभीर चुनौती है. उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ, आज वही जल संसाधन संकट में हैं और यह समस्या वैश्विक स्तर पर गंभीर रूप ले चुकी है।
जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ा है
अपने व्याख्यान में उन्होंने बताया कि बढ़ती जनसंख्या, तीव्र औद्योगीकरण, शहरीकरण और संसाधनों के अनियंत्रित उपयोग के कारण जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ा है. साथ ही वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि क्षरण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं मानव अस्तित्व के लिए खतरा बनती जा रही हैं. उन्होंने चिंता जताई कि आज विश्व के अधिकतर लोग प्रदूषित वायु में सांस लेने को विवश हैं, वहीं भारत के कई शहर भी प्रदूषण के उच्च स्तर से जूझ रहे हैं।
डॉ. तिवारी ने चेतावनी देते हुए क्या कहा?
डॉ. तिवारी ने कहा कि देश में बढ़ते लैंडफिल, प्लास्टिक कचरे की समस्या, प्रदूषित नदियां और जैव विविधता का ह्रास, असंतुलित विकास प्रक्रिया के स्पष्ट संकेत हैं. जल संकट पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि भारत में वर्षा का असमान वितरण और भूजल का अत्यधिक दोहन स्थिति को और गंभीर बना रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में जल की मांग और आपूर्ति के बीच भारी अंतर उत्पन्न हो सकता है।
शास्त्रों में प्रकृति को ‘माता’ कहा गया है
उन्होंने भारतीय सनातन संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे शास्त्रों में प्रकृति को “माता” के रूप में स्वीकार किया गया है. वेदों और पुराणों में वर्णित पंचमहाभूत-जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश जीवन के आधार हैं. उन्होंने प्रसिद्ध उक्ति “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है।
पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया
सनातन परंपरा में नदियों की पूजा, वृक्षों की रक्षा और संसाधनों के संतुलित उपयोग की भावना सदैव रही है. समाधान के रूप में उन्होंने वर्षा जल संचयन, जल पुनः उपयोग, सूक्ष्म सिंचाई तकनीक, भूजल पुनर्भरण तथा जल प्रदूषण नियंत्रण जैसे उपायों को अपनाने की आवश्यकता बताई. पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण, प्लास्टिक उपयोग में कमी, कचरा प्रबंधन, स्वच्छ ऊर्जा के प्रयोग और औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण पर भी विशेष बल दिया।
वक्तव्य का समापन इस संदेश के साथ किया
उन्होंने केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत अभियान, नमामि गंगे परियोजना और राष्ट्रीय सौर मिशन, का उल्लेख करते हुए कहा कि इन प्रयासों के साथ-साथ जनभागीदारी भी अत्यंत आवश्यक है. अंत में उन्होंने कहा कि सतत विकास केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को जिम्मेदारी निभानी होगी. उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन इस संदेश के साथ किया “प्रकृति के साथ संतुलन ही विकास का वास्तविक मार्ग है।
इन विषयों पर जानकारियां दी गई
एनएमडीसी पन्ना के डिप्टी मैनेजर भूविज्ञान संतोष पाठक ने पन्ना के डायमंड की प्राप्ति और प्रकारों की विस्तृत जानकारी प्रदान की. डॉ. मुकेश येंगल ने बढ़ती हुई जनसंख्या एवं जलसंसाधनों की कमी के कारण होने वाली समस्याओं की ओर अपना ध्यान आकर्षित कराया. शोधार्थी विजय कुमार सोनी अपने प्रस्तुती करण मे डायमंड के उत्खनन से संबंधित तकनीकों की जानकारी साझा की.
डॉ. सनत तिवारी ने क्या कहा?
डॉ. सनत तिवारी अपने वक्तव्य में कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण ही कृषि के स्थायी विकास का आधार है. उन्होंने वैज्ञानिक पद्धतियों एवं पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि सेमीनार के सफल आयोजन हेतु आयोजकों को बधाई दी और कहा कि इतने कम समय में राष्ट्रीय सेमीनार कराना आसान नहीं होता।
संगोष्ठियां विद्यार्थियों को नई दिशा प्रदान करती हैं
डॉ. अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियां विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को नई दिशा प्रदान करती हैं. उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को शिक्षा का अभिन्न अंग बताते हुए युवा पीढ़ी को इसके प्रति जागरूक रहने का संदेश दिया. इन दो दिनों में लगभग 200 शोध कर्ताओं ने अपने शोध पत्र पंजीकृत किए तथा लगभग 150 से अधिक शोधार्थियों ने तकनीकी सत्रों में अपने शोध कार्य की विवेचना की।
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